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यूसीसी के प्रस्तावित प्रावधानों पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद का कड़ा विरोध, धार्मिक अधिकारों और पर्सनल लॉ की सुरक्षा की उठाई मांग

 यूसीसी के प्रस्तावित प्रावधानों पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद का कड़ा विरोध, धार्मिक अधिकारों और पर्सनल लॉ की सुरक्षा की उठाई मांग

लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता देने पर जताई गंभीर आपत्ति, समिति को सौंपा विस्तृत ज्ञापन


   शहडोल। मध्य प्रदेश में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) के प्रारूप को लेकर अब विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं तेज होती जा रही हैं। इसी क्रम में जमीयत उलेमा-ए-हिंद, जिला इकाई शहडोल ने प्रस्तावित यूसीसी के कई प्रावधानों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संगठन ने विशेष रूप से लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण तथा व्यक्तिगत कानूनों में संभावित हस्तक्षेप को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के जिला अध्यक्ष मौलाना जरयाब साकिबी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने माननीय न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) श्री रंजन प्रकाश देसाई, अध्यक्ष म.प्र. UCC समिति एवं अन्य समिति सदस्यों के नाम कलेक्टर शहडोल के माध्यम से एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में संगठन ने स्पष्ट रूप से कहा कि यूसीसी के कई प्रस्तावित प्रावधान न केवल संवैधानिक मूल्यों बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों को भी प्रभावित कर सकते हैं।

ज्ञापन में उल्लेख किया गया कि भारत विश्व का ऐसा लोकतांत्रिक देश है जिसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक बहुलता और सामाजिक समरसता है। संविधान निर्माताओं ने इसी विविधता को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म, परंपराओं और व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार जीवन जीने का अधिकार दिया है। जमीयत का कहना है कि मुस्लिम समाज के पारिवारिक और सामाजिक मामलों—जैसे निकाह (विवाह), तलाक, विरासत, खुला, हिबा (दान)—के स्पष्ट नियम इस्लामी शरीयत के अंतर्गत निर्धारित हैं, जिनमें किसी प्रकार का बाहरी हस्तक्षेप समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकता है।

संगठन ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 27 और 28 का हवाला देते हुए कहा कि ये अनुच्छेद प्रत्येक नागरिक को अंतरात्मा की स्वतंत्रता, अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। ज्ञापन में कहा गया कि किसी भी कानून के निर्माण के दौरान इन संवैधानिक अधिकारों का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए।

जमीयत ने विशेष रूप से लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता देने और उसके पंजीकरण की अनिवार्यता पर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि यह व्यवस्था भारतीय सामाजिक संरचना, पारिवारिक मूल्यों और नैतिक मान्यताओं के विपरीत है। संगठन का कहना है कि विवाह संस्था भारतीय समाज की आधारशिला रही है और ऐसी व्यवस्थाएं पारिवारिक ढांचे को कमजोर कर सकती हैं। ज्ञापन में इसे सामाजिक और नैतिक दृष्टि से गंभीर विषय बताते हुए पुनर्विचार की मांग की गई।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने यह भी कहा कि किसी भी समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान उसके व्यक्तिगत कानूनों से गहराई से जुड़ी होती है। ऐसे में यदि बिना व्यापक सहमति और संवाद के किसी एक समान कानून को लागू किया जाता है तो इससे सामाजिक असंतोष और वैचारिक टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। संगठन ने सरकार एवं समिति से आग्रह किया कि सभी समुदायों, धार्मिक संगठनों और विधि विशेषज्ञों से व्यापक संवाद स्थापित कर संतुलित निर्णय लिया जाए।

अंत में संगठन ने समिति से मांग की कि यूसीसी के प्रारूप पर पुनर्विचार करते हुए उन सभी प्रावधानों को हटाया जाए जो धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत कानूनों और संवैधानिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हों। जमीयत के पदाधिकारियों ने कहा कि देश की एकता, भाईचारा और सामाजिक समरसता तभी मजबूत होगी जब सभी धर्मों, परंपराओं और मान्यताओं का समान सम्मान सुनिश्चित किया जाएगा।

“विविधता में ही भारत की असली शक्ति है, और उसी का सम्मान राष्ट्रहित में सर्वोपरि है।”

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